देहरादून,
मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के गृह जनपद उधमसिंह नगर से दुखद और स्तब्ध करने वाली खबर सामने आई है। यहां किसान सुखवंत सिंह ने आत्महत्या कर ली। यह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि उस टूटे हुए सिस्टम की निर्मम सच्चाई है जिसमें आज प्रदेश के किसान, मजदूर और आम जनता जीने को मजबूर हैं। किसान की यह दर्दनाक मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान है।
सुखवंत सिंह की जमीन पर धोखाधड़ी हुई। वो न्याय मांगने सरकारी दफ्तरों और पुलिस थानों के चक्कर काटता रहा। लेकिन न्याय देने वाली मशीनरी ने उसे राहत देने के बजाय बेइज्जत करने का काम किया। एक किसान जिसने मेहनत से जीवन भरा, उसी को अपमान, धक्के और गालियाँ मिलीं। संवेदनहीन और सुस्त प्रशासन ने उसकी आवाज दबा दी और अंत में उसने जिंदगी से हार मान ली। यह घटना व्यवस्था की नाकामी और क्रूरता को नंगा कर देती है।
मुख्यमंत्री जी को सोचना होगा कि आखिर राज्य की पुलिस कानून व्यवस्था छोड़कर जमीनों के दलालों और कब्जेदारों की छत्रछाया में क्यों काम कर रही है। पुलिस का काम जनता को सुरक्षा देना था, परंतु अब किसानों की जमीनें छीनने, शिकायत करने वालों को डराने और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने में लगी दिखाई दे रही है। यह आत्महत्या किसी एक मामले का नतीजा नहीं, बल्कि लंबे समय से सड़ रही प्रशासनिक और राजनीतिक मानसिकता का परिणाम है।
अभी हरिद्वार में पुलिस अभिरक्षा में हिस्ट्रीशीटर की हत्या की आग शांत भी नहीं हुई थी कि अब यह किसान आत्महत्या सामने आ गई। दोनों घटनाएं साफ दिखाती हैं कि राज्य की व्यवस्था कहीं न कहीं नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। पुलिस पूछताछ में मौत हो या किसान की आत्महत्या..नियंत्रण, जिम्मेदारी और मानवता तीनों सवालों के घेरे में हैं।
सवाल यह नहीं कि किसान क्यों मरा, सवाल यह है कि वो जीते हुए क्यों मरता रहा? कितने किसान और आम नागरिक न्याय मांगते-मांगते अपनी उम्मीदें और अंत में जान गंवा देंगे? मुख्यमंत्री जी को यह समझना होगा कि भाषण और दावे जमीन पर नहीं चलते। जब आपके अपने जिले में किसान आत्महत्या करे तो यह सिर्फ दुखद घटना नहीं, यह आपकी सरकार की कानून व्यवस्था की विफलता की खुली घोषणा है। अब जवाबदेही, कार्रवाई और सुधार की जरूरत है वरना ऐसी मौतें हमारा कड़वा भविष्य बन जाएंगी।
श्री करन माहरा
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष उत्तराखंड कांग्रेस कमेटी एवं CWC सदस्य