सुखन कतरा – कतरा ” महेंद्र प्रकाशी “

जिंदगी का चित्रण
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शहरी जो हो गये हैं, सब क़ैद है घरों में।
दिन बीतें दफ्तरों में,अब रातें बिस्तरों में।।

बीमार हो गये हैं, सब काम छुट गये हैं।
रहते हैं अस्पतालों के, अब सभी डरों में।।

ऐसी सियासी चालें,चलते हैं अब तो रहबर।
करते हैं बाज़ शामिल, सीधे कबूतरों में।।

देखेंगे काटकर अब, सारे दरख़्त हम भी।
कितनी बचीं उड़ानें, सुरख़ाब के परों में।।

दरबारों के लिए जो, हमने कभी न गाया।
गिनती नहीं हमारी, होती सुख़नवरों में।।

गाँवों में जाके देखो, ख़ुशहाल ज़िंन्दगी है।
बरकत बरस रही है हर रोज़ छप्परों में।।