लिखने-कहने के लिए, अब फिर हूँ मजबूर।
मज़लूमों के दर्द से, कैसे रहना दूर!!
कोई जूता मार दे, कोई ले ले जान।
अपने भारत की बनी, ये कैसी पहचान!!
जिसकी ले सकते नहीं, आप सड़क पर जान।
उसपर जूते फेंकना, करना यों अपमान।।
सर्वाधिकार सुरक्षित -महेन्द्र प्रकाशी