जात – पात की शरण में कब तक हुलिया बदलेंगे अपराध – चिंतन

आपराधिक मामलों में जात पात को बीच में लाना कितना उचित और क्यों ? महेंद्र प्रकाशी ( MA,BEd )

क्या हम वास्तव में ही चल पड़े हैं मध्यकाल की ओर, नहीं तो ऐसा भी क्या कि कथित दलितों पर लगातार हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ बोलने के लिए हमारी ज़बानें इतनी भारी महसूस हो रही हैं हमें कि उठती ही नहीं!

तीन-तीन हालिया अत्यंत वीभत्स घटनाओं का अलग-अलग राज्यों में एक साथ घट जाना, और तीनों राज्यों में हमारी ही पार्टी की सरकारों का होना, और उन पर हमारी चुप्पियों का पसर जाना आख़िर क्या दर्शाता है!

चलिए माना कि राजनीतिकों की अपनी मजबूरियाँ हैं, पर हम हिंदुस्तान के सारे कथित बड़ी जात वालों को क्या साँप सूंँघ गया है, जो उनके पक्ष में खड़े होने के बजाय उल्टा उन्हीं को गरियाने में लगे हैं!
और फिर यह जात-वात है क्या, जिसके पीछे हम इतने पागल हैं! प्रकृति ने सबको अपने हित साधन के लिए बनाया है, क्या हमें इतनी छोटी-सी बात समझ नहीं आ रही है!

ज़रा भी ग़ौर फ़रमायें तो वही जातियांँ अधिक उपयोगी जान पड़ती हैं देश-दुनिया-समाज के लिए, जिन्हें हम लगातार हाशिये पर धकेले हुए हैं और उनसे हद दर्ज़े की घृणा करते है ।